संबल


 ठंडी मोहक हवाएँ बरसते बादल और झूमती पीपल की शाखाये, 

मुझे अपनी ओर खींचने को प्रकृति का इतना निमंत्रण काफी है ,,

जल का कोई भी स्रोत हो मुझे लुभावना लगता है, समंदर, नदी, तालाब, झरने, बहता पानी, सब मेरे मन को छूते है, 

यहां तक ​​की यात्रा के क्षणों में सड़क के किनारे के साथ के साथ पानी से भरे धान के खेत और गड्ढे भी मुझे आकर्षित करते हैं, हरे-हरे खेत पानी से भरे उनके किनारे जैसे मेरे साथ साथ मन ही मन मे दौड़ते, वर्षा ऋतु में में बहुधा दिल करता की बस गाड़ी की गति रुकवा कर उतर जाऊँ, और दौड़ कर पहुँच जाऊँ पानी से भरे हरे हरे मखमली कालीन पर जोर- जोर से कूदते कूदते पानी के उन गड्ढों को छपाक- छपाक की आवाज़ भर दूँ। । 

मे मन की ये इच्छा मन मे ही रह जाती है…।

 बचपन मे पापा और अब फिर पतिदेव नहीं करने देते, शायद दोनो के ह्रदय में मेरी सुरक्षा का दायित्व मेरी खुशी से ज्यादा महत्वपूर्ण था और होना भी चाहिए, हम जिनसे जुड़े होते हैं उनकी सुरक्षा, उनकी देखभाल ही हमारा पहला दायित्व होना चाहिए।

 

पर मेरे ससुर जी ...... 

वह कभी नहीं रोकते थे क्योंकि वह भी मेरी ही तरह जलप्रेमी, प्रकृति प्रेमी थे, उन्होंने हमेशा बेटी बना कर रखा, बहुत मायनों में जन्मदाता पिता से भी ज्यादा ससुर जी के साथ आधिकारिक व्यवहार रहा,


वर्षा ऋतु और पापा जी दोनो का समन्वय बड़ा ही गज़ब का था, इधर बूंदों ने रफ़्तार पकड़ी, उधर पापा जी की सवारी तैयार ...।

मिठाइयों के डब्बे, नाश्ता, खाने के सभी साजो-सामान के साथ उनकी विशेष रूल नुमा छड़ी चमका दी जाती थी, जिस हाथ में ले वो इस रुतबे से घुमाया करते की सामने वाले उन्हें अक्सर अधिकारी ही समझ लेते हैं, और जानकर  सेठ जी ( पापाजी सेठ जी के नाम से ही जाने जा रहे थे) की इस अदा से पूर्व परिचित थे ही।

बहुत मज़ा आता है पापा के साथ, हमारे शहर मिर्ज़ापुर की वादियों वार्षिक ऋतु में अतुलनीय सौंदर्य प्रस्तुत करती है, किंतु ना जाने क्यों स्थानीय प्रशासन हमेशा से इसके विकास के औचित्य से निर्विकार रहता है, खैर ......


 विंढमफॉल, सिरसी, खरंजा, सिद्धनाथ की दरी, देवदरी, राजदरी, जाने और भी कितने छोटे-बड़े खूबसूरत झरनों से लैस स्थान जो मिर्ज़ापुर को विशिष्ट बनाने में अपना योगदान बनाए रखना है, स्थानीय लोगो के लिए बाटी चोखा के साथ पिकनिक का माध्यम रहा।  है तो वहाँ सैलानियों के भी आकर्षण का कारण बना करता है,

जी जब अपने नगर सेठ पापा के रौबदार व्यक्तित्व का प्रभाव बिखेरते हुए झरनों के पानी में उतरते में तो आस -पास के लोग अदब से उस जगह को हम लोगो के लिए खाली कर देते दूसरे किनारों पर चले जाते हैं , पापा जी झरने से बाहर और  निकलने का नाम ही ना लेते, साथ में हम सब भी बहुत मजे करते हैं,

हाँ पति देव जरूर किनारे पर बैठे जान सांसत में किए गए अपने "जान" को जान हथेली पर किए पानी में अठखेलियाँ करते बेबस से देखते रहते हैं क्योंकि पापा जी के आगे उनकी चलनी नहीं थी और बहूजी पापा जी की चहेती रही थी,

हाँ बीच बीच में मेरे नाम का उच्चारण करना नहीं भूलते थे साथ ही छिपा हुआ मौन अनुरोध पत्नी को समर्पित रहता था, अब निकलो, पत्थरो पर सम्भल कर पैर रखना, पानी की धार बहुत तेजी से वगैरह वगह ...

आज पापा जी नहीं हैं, और ना ही अब झरनों सी बहती वो स्वतंत्र जीवन की धारा ...।

सब कुछ सिमट गया, रिश्ते नाते सभी उदासीन से, अपने अपनों से दूर अपने ही  खोल में कछुए सा सिमटते रहे रहे ,, 

सावन-भादो अब भी हर साल आता है, बारिश कम या ज्यादा हर बार ही प्रकृति की दशा के अनुसार अब भी बरसती है, लेकिन अब बरसती बूंदे मन को नहीं भिगो पाती, मौसमों में झरनों से अब भी पानी की धराएं बहती होंगी, पर शायद अब वे भी बस तपते चट्टानों टकरा पूरी गति से नीचे बहती पहाड़ी नदी में तब्दील होते चले जाते होंगे,

प्रेम की कुछ फुहारें मन की भिगो सके ऐसा कोई रिश्ता उन झरनों के नीचे अठखेलियाँ जो नहीं करता होगा,

झरनों से बहता पानी और मन की गति दोनो की धार एक सी ...

अनवरत, किंतु बारिश के इंतजार में हमेशा आस रत वो चाहे मौसम की बारिश हो या सम्बन्धों में प्रेम की,

पापा जी की अनेकों ऐसी मीठी यादें जो बरबस मुस्कान बिखेरती है, 

और  देती हैं ...

            "सम्बल" जीवन जीने का, 

  कठिन से भी परिस्थितियों में भी हौसला बनाये रखने का ।।






मेरी आने वाली पुस्तक "संस्मरण भवन" के कुछ पन्नों में से ...।






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